अजनबी शाम

 

ऐक हसी शाम अजनबी सी हो गई,
मेरी सांसे भी अनकही सी हो  गई।

वो चहेरे तो कभी आंखो में न मिले,
जिन की परछाईयां प्यारी सी हो गई।

हम उन से जब ज़रा से दूर गये थे ,
भीड में ये तन्हाई तन्हा सी हो गई।

दिल की कच्ची ज़मी पर आना उनका ,
और ,लहू की झील गहरी सी हो  गई।

कूछ भी नां कहेते हूऐ सबकुछ कहे गई,
उनकी आंखो से बात न्यारी सी हो गईं।

येे वही है बात तो प्यार भरी अब भी
हमारी कहानी कैसे पुरानी सी हो गई।

– मनीषा ‘जोबन’

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